प्रेमचंद की कहानी व उपन्यास आज भी सामयिक।

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प्रेमचंद दबे कुचले शोषितों के सिपाही थे।

शोषितों अभिवंचितों की आवाज थे मुंशी प्रेमचंद जी।

प्रेमचंद जी यथार्थवादी साहित्यकार थे।

साहित्य जगत के धरोहर है मुंशी प्रेमचंद।

नालंदा से डीएसपी सिंह।

अभिमन्यु सिंह कि रिपोर्ट

साहित्यकार, कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 82 वीं पुण्यतिथि सोमवार को नालन्दा जिला मुख्यालय बिहार शरीफ के नालंदा नाट्य संघ के सभागार में साहित्यकार डा. हरिश्चंद्र प्रियदर्शी की अध्यक्षता में आयोजित की गई।
कार्यक्रम का संचालन नाटककार रामसागर राम ने किया।पुण्यतिथि समारोह में मौजूद लोगों ने प्रेमचंद की तस्वीर पर पुष्पांजलि व माल्यार्पण कर श्रद्धा सुमन अर्पित किया।
सभा में साहित्यकार, मगही कवि डा. हरिश्चंद्र प्रियदर्शी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के भारतीय लेखकों में से एक है। जिनकी कृतियों में हमेशा शोषितों की आवाज बनकर रहते थे। उनकी लेखनी में सामंती व्यवस्था पर कटाक्ष रहता है। प्रेमचंद की लेखनी में सदैव समाज के कमजोर वर्ग को बेबस को मुख्य पात्र बनाकर चित्रण करना उनकी दृष्टि को उजागर करता है। उन्हें उपन्यासकार का योद्धा कहा गया है। गोदान, गबन जैसे उपन्यास पुस की रात और मानसरोवर जैसी कृतियां आज विश्व स्तर पर ख्याति अर्जित की है।

मौके पर साहित्यकार प्रो. लक्ष्मीकांत सिंह ने कहा कि प्रेमचंद का पूरा जीवन समाज के वंचित और शोषितों के प्रति सदैव समर्पित रहा है। प्रेमचंद किसानों व मजदूरों के कथाकार थे। इन्होंने आजीवन साम्राज्यवाद के खिलाफ रचना की। प्रेमचंद के ग्रामीण परिवेश में जो कुरीतियां थी, वह आज भी अपना रूप बदल कर विद्यमान है। उन्होंने प्रेमचंद की कहानी “घासवाली”का चित्रण करते हुए मुलिया चमारण के प्रेम को बखूवी चित्रण किया।

समारोह में मशहूर कवि अर्जुन प्रसाद बादल ने अपने सम्बोधन में कहा कि मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में समाज के कुछ गिने चुने लोग समाज पर अधिकार जमाना चाहते थे जिसे प्रेमचंद ने अपनी लेखनी में सदैव नकारने का काम किया है। वे सर्वहारा वर्ग के लिए कहानी व उपन्यास लिखते थे, जो कि आज भी सामयिक है। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार उस समय भी था और आज भी है इस लिए प्रेमचंद की कहानियां व उपन्यासों में कही गई बातें आज भी प्रासंगिक हैं। वर्षों पूर्व उन्होंने इस बात का चित्रण कर लिया था जो आज हमारे जीवन व संस्कारों से जुडे हुए हैं।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए साहित्यप्रेमी राकेश बिहारी शर्मा ने कहा कि कबीर के बाद मुंशी प्रेमचंद जी पहले ऐसे लेखक थे जिन्होंने समाज की खराब व्यवस्था को अपनी लेखनी के माध्यम से उठाया। प्रेमचंद ने जाति-प्रथा, परिवारवाद, महिलाएं और मजदूरों की बात हमेशा उठायी । उनकी कई किताबें सरकार द्वारा बैन कर दी गयी थी। लेकिन मुंशी प्रेमचंद जी ने कभी हार नहीं मानी और लिखना कभी भी बंद नहीं किया। मुंशी प्रेमचंद्र ने कहानी के माध्यम से गांव की गरीबी को समाज के सामने रखा था। उन्होंने समाज में हो रहे अत्याचार पर भी जमकर कुठाराघात किया। मुंशी प्रेमचंद क्रांतिकारी रचनाकर थे। वह समाज सुधारक और महान विचारक भी थे। उन्होंने 300 से अधिक कहानियाँ लिखी। प्रेमचंद की ‘नमक का दरोगा’, ‘ईदगाह’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘बड़े भाई साहब’, ‘पूस की रात’, ‘शतरंज के खिलाडी’ और ‘कफन’ जैसी कहानियाँ आज विश्व साहित्य का हिस्सा बन चुकी हैं। साहित्य को सत्य का आईना बनाकर, मानवता के उच्च आदर्शों का जिस तरह मुंशी प्रेमचंद ने चित्रण किया, वह आज भी प्रासंगिक है। सदी के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की पुण्यतिथि पर उनको श्रद्धांजलि। प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कृति गोदान, कर्मभूमि, गबन, रंगभूमि आदि थे। आज के बढ़ते विज्ञान के युग में साहित्य के प्रति छात्रों की लगातार घट रही रूचि को बढ़ाने के लिए साहित्य व साहित्यकार प्रेमचंद जैसे शख्सियतों की जयंती व पुण्यतिथि मनाना ही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए नाटककार रामसागर राम ने कहा कि प्रेमचंद ने सांप्रदायिकता, अंधविश्वास व कुरीतियों के खिलाफ कहानी व उपन्यास के माध्यम से जन आंदोलन चलाया।

गीतकार कवि मुनेश्वर शमन ने मुंशी प्रेमचंद जी के बारे में बताते हुए कहा कि प्रेमचंद जी उर्दू तथा हिंदी के एक महान कवि थे, जो की एक कवि व लेखक के अलावा अध्यापक, लेखक तथा पत्रकार भी थे। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में लमही नामक ग्राम में हुआ था तथा इनकी मृत्यु 8 अक्टूबर, 1936 में वाराणसी में हुई थी।

मौके पर नालंदा नाट्य संघ के नाटककार रामसागर राम ने अपनी मंडली के साथ कई प्रेरणा दायक गीत भी प्रस्तुत किया।

इस दौरान कवि सुभाषचंद्र पासवान, साहित्यकार एके पटेल, सुशांत कुमार, संगीतकार अशोक कुमार, अजय कुमार, निशांत कुमार,शंकर कुमार इत्यादि लोगों ने भाग लिया।

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